शनिवार, 24 जुलाई 2010

सफलता के राज

वो अब अपनी सफलता की वजह किसी क्रीम या पाऊडर या किसी कोल्ड ड्रिंक को बतायेंगी। जी हम साइना नेहवाल की बात कर रही हैं। बैडमिंटन की स्टार बनकर वह इस काबिल हो गयी हैं अब। बंदा या बंदी शुरु शुरु में पूरी मेहनत और समर्पण से आगे बढ़ता है, जैसे ही आगे बढ़ता जाता है, उसे इलहाम होने लगता है कि हाय उसकी सफलता के पीछे तो फलां वाला मोबाइल फोन या फलां वाले गहने हैं। करीब 9098098308 ब्रांडों के अंबेसेडर बने एक प्लेयर से इस मसले पर विस्तार से बात हुई-
सवाल-पहले आप अपनी सफलता का श्रेय अपने कोच को देते है, अब उस कोल्ड ड्रिंक को देते हैं। यह क्या मतलब है।
ब्रांड अंबेसडर -देखिये मुझे रुपये कोच से नहीं कोल्ड ड्रिंक से मिलते हैं। फिर मैं अपनी सफलता का श्रेय कोच को क्यों दूं।
सवाल-नहीं मतलब पहले आप कहते थे कि आपकी सफलता के पीछे आपकी मेहनत या आपका समर्पण है।
ब्रांड अंबेसडर-मेहनत क्या किसी कोल्ड ड्रिंक का नाम है या समर्पण बीयर के किसी ब्रांड का नाम है क्या। अगर मेहनत कोई कोल्ड ड्रिंक होता, तो मैं जरुर कहता कि मेरी सफलता के पीछे यह है। पर मेहनत अभी किसी ब्रांड का नाम नही है, सो मैं कैसे कह सकता हूं कि यह मेरी सफलता के पीछे है।
सवाल-नहीं मेरा मतलब है कि छोटे बच्चे कनफ्यूज हो जाते हैं। उन्हे यह बताओ कि आपकी सफलता के पीछे आपका हार्डवर्क है, तो वह डांटकर कहते हैं कि नहीं वो तो उस वाले कोल्ड ड्रिंक को पीकर सक्सेस हुए हैं। देखने की बात यह है कि ऐसा होना चाहिए।
ब्रांड अंबेसडर-हीही बच्चे हैं कनफ्यूज हो जाते हैं। उन्हे बताइए कि मेरी सक्सेस के पीछे अब आंटी चिप्स हैं। आंटी चिप्स का इंडोर्समेंट मैंने अभी ही शुरु किया है। इसे प्रमोट करना है। बीच में मैंने उस वाले मोबाइल को प्रमोट किया था और बताया था कि सारी सफलता मुझे इस वाले मोबाइल को खऱीदने के बाद ही मिली है।
सवाल-बच्चे आपकी बात सुनते हैं, आप उन्हे अच्छी अच्छी बातें क्यों नहीं बताते हैं।
ब्रांड अंबेसडर-मुझे अच्छी बातें दो ही लगती हैं, एक तमाम ब्रांडों का इंडोर्समेंट करना और दूसरे इस काम का पेमेंट लेना। आप बतायें इनमें से कौन जी बात बच्चों को बताऊं।
सवाल-ओफ्फो, ब्रांड रुपये इसके अलावा आप कुछ और सोचते भी हैं कि नहीं।
ब्रांड अंबेसडर-मैं रुपयों के अलावा अब डालरों पर सोचता हूं। डालर वाले इंडोर्समेंट अभी ज्यादा नहीं हैं, जब ये ज्यादा हो जायेंगे,तब इन पर भी और ज्यादा सोचूंगा।
सवाल-आपकी प्रेरणा के स्त्रोत कौन हैं। सचिन तेंदुलकर या महेंद्र सिंह धोनी।
ब्रांड अंबेसडर -महेंद्र सिंह धोनी, क्योंकि उनकी ब्रांड वैल्यू 200 करोड़ से ऊपर है। यह सम्मान अभी सचिन तेंदुलकर नहीं हासिल कर पाये हैं। रन वन से नहीं, ब्रांड वैल्यू से खिलाड़ी नामी माना जाता है। बच्चों को मेरा संदेश है कि धोनी से आगे जाकर दिखाओ और 200 करोड़ रुपये से ज्यादा का माल बेचकर दिखाओ।
guru dev...alok puranik ki klam se..

शनिवार, 10 जुलाई 2010

भक्त भोग भगवान
मैं बचपन से सुनता आया था।कि भक्त और भगवान का रिश्ता अटूट होता है।इनके बीच का बन्धन फैविकौल के मजबुत जोड की तरह सुद्र्ढ होता है।भक्त भगवान से जब चाहे साक्षात्कार कर सकता है।और भक्त की एक पुकार पर भगवान दौडे चले आते हैं।लेकिन काफी समय भगवान के इंतजार में गुजरने के पश्चात हमें लगा की भक्तो की संख्या बेरोजगारों की बढती हुई संख्या की तरह बढ जाने से भगवान को हमारी सुधि नही आयी शायद इसी लिये
हमारी अपाइंटमेंट मिस हो रही है।हमारे दिल ने कहा क्या हुआ जो नारयण को हमसे मिलने
का समय नही मिल रहा।हम ही ’उनसे’मिल आते है।अब समस्या ये कि भगवान से कंहा मिला जाये।इस समस्या को हल किया हमारे परम मित्र तिवारी ने ।बोले-भगवान भक्तो से मिल कर अपने घर तो वापस आते ही होंगे।हम उनके गॉव पहुंचकर उनके निवास पर ही उनसे मिल लेते है। हम श्रद्धापूर्वक (नंगे पैर बाइक पर सवार होकर) मथुरा भगवान श्री कृष्ण से मिलने पहुंच गये। स्नान-ध्यान के पश्चात जब हमने उनके सदन मै प्रवेश किया तो देखा कि भगवान के द्वार पर आवेदको की लम्बी क्यु है।हमने अपने मित्र से कहा ‘भईया तिवारी’ पब्लिक तो इनके निवास पर ही इतनी है कि भगवान बाहर के भक्तो को दर्शन देने कैसे जाते होगें।जब हमें लाइन में खडे-2 एक घण्टा गुजर गया और पंक्ति एक गज भी आगे नही बढी तो हमारा धेर्य जवाब दे गया।हमने कहा भई तिवारी ये पंक्ति आगे क्युं नही चल रही,चलो पंक्ति तोड कर ही आगे बढ जाते है।तिवारी ने कहा महोदय लाइन मे लगे रहोगे तो नम्बर आ भी सकता है।बिना लाइन के तो भोग वालो का ही नम्बर आता है।जो तुम्हारे पास है नही।हमने समझकर भी अनजान बनते हुऎ कहा- सखा तिवारी भगवान भोग तो हमारे हाथों में है।फिर तुम कौन से भोग की बात कर रहे हो।तिवारी हमारा हाथ पकडकर पंक्ति से निकाल लाये और समझाते हुऎ बोले महोदय जब किसी बडे अधिकारी से कोई काम निकलवाना हो तो पहले उसके चपरासी को प्रसन्न करना पडता है।और उन्हें आदर पूर्वक भोग भेंट करना पडता है।अब यदि वो भोग उन्हें पसन्द है।तो अधिकारी से आपकी मुलाकात पक्की इसी तरह का कानून भगवान के निवास पर भी है।यदि आपको भगवान से मिलना हो तो डाक्टर के एमरजेंसी चार्ज की तरह आपको भी एमरजेंसी भोग देना होगा तभी ये पुजारी महोदय भगवान से मिलने दे सकते है।अब कैजुअल और स्पेशल में कुछ तो अंतर होगा ही,या नही।तभी अचानक हमारी द्र्ष्टी दो दरवाजे से होती हुई तीसरे दरवाजे तक पंहुची जंहा भगवान का सिंहासन था। महंत आठ सात भक्त व भक्तिनो को भगवान के चरणो में विठाकर पूजा अनुष्ठान करा ईश को प्रसन्न करने की कोशिश मे लगा था।शायद इसीलिये पंक्ति आगे नहीं बढ़ रही थी।और हम जैसे भक्त भगवान से बीस गज दूर खडे थे।अंतर सिर्फ इतना था की अन्दर वालों पर लड्डूओं से भरे थाल और नोटों से भरी जेब का भोग था।जबकि हमारे पास सवा दो रूपये का।
अब हमारी समझ मैं आ गया था कि आज कल भगवान भक्तों से मिलने क्यों नही आते।अब ये भी क्या कि आओ और वरदान भी दो। जब वैठे-बिठाये देने की बजाये और मिल रहा हो।तो कंही जाके दर्शन देने की क्या आवश्यकता है।कुछ देर मे वे भक्त पूजा कर चले गये अब हम ‘जैसे’ सामान्य भक्तों की बारी थी।महंत ने कहा, सभी भक्त अपना भोग पहले दरवाजे से अन्दर फैकते जायें और निकलते जायें।भगवान भोग फेंका जाने लगा,भगवान उस भोग में दब गये।और हम भी सोचने लगे कि बिना भोग के भगवान के दर्शन करना पाप करने के समान है।हम टूटे मन से वापिस आ गये और मन बहलाने को सोचने लगे कि ईश्वर तो सब जगह ही फिर कहीं जाने की क्या आवश्यकता है।‘क्यों ठीक है न’।
(समाप्त)
भारतीय रेल बनाम मैट्रो रेल

देश के विकास मे रेलगाडी का अपना विशेष महत्व रहा है।बचपन में जब मैं पहली बार रेलगाड़ी में बैठा तो लगा था जैसे मैं विकासशील से विकसित हो गया हुं।वैसे कुछ भी कहिये रेलगाडी का सफर है मजेदार, ऐसा आन्नद सिर्फ लोकल बस को छोड्कर कहीं नही आ सकता। लेकिन देश में विकास की गति के अनुरूप ही रेलगाडी का भी विकास होता गया है।शयनयान बन गये,वातानुकूलित प्रथम,द्वितीय,तृतीय बन गये ।
यंहा तक तो ठीक था ।लेकिन मैट्रो रेल ने आकर तो जैसे सारे सफर का सत्यानाश ही कर दिया है। अब देखिये भारतीय रेल में यात्रा का आन्नद ही कुछ और था।पहले पता करो फलां स्टेशन के लिये कौन सी ट्रेन और कितने बजे जायेगी।फिर उसके टिकिट लेने में नहीं, तो ट्रेन में अवश्य एक न एक सम्बंध बन जाता था। अब मैट्रो में बैठो दस मिनट पश्चात गंतव्य पर,हैलो हाय भी हो जाये तो बहुत समझिये। ट्रेन के सफर में जाने से पहले एक घंटे पहले स्टेशन पहुंचना होता था।बेशक इंतजार क्यों ना करना पडे, भागमभाग मे कभी ट्रेन निकल जाती तो पता चलता कि अगली ट्रेन तो भाई पांच घंटे बाद है। मैट्रो ने इंतजार का सारा मजा ही किरकिरा कर दिया है,हर पांच मिनट में ‘चिराग के जिन्न’ की तरह प्रकट हो जाती है।
अब ‘जो मजा इंतजार में है,विसाले यार मे कहां’। ट्रेन में पडोसी से बात करने की सारी सम्भावनओं की हंता है मैट्रो रेल ।
सुनिये- अगला स्टेशन कौन सा है?
कोई योवना या नवयोवना पूछ लेती थी तो अगला स्टेशन बताने के साथ ही कई और अगले प्रश्न करने का मौका मिल जाता था।
प्रेममनगर है जी वैसे आपको कहां जाना था जी। अच्छा हुआ जो आपने ये गाडी पकड़ ली अगली गाड़ी पाँच बजे थी।
अब मैट्रो में गंतव्य से पहले ही बधिरों के लिये अगले स्टेशन का नाम लिखा आ जाता है,द्रष्टिहीनों के लिये उदघोषिका विनम्रतापूर्वक बता देती है।जो चक्षु व कर्ण दोनों रखते हैं वे दोनों कार्य करते हैं
और तो और वो कर्णप्रिय आवाज ये भी बता देती है कि दरवाजे किस तरफ खुलेंगे।
टकराने की सम्भावनाओं की भी इतिश्री।लेकिन भारत के मैट्रो शहर दिल्ली,मुम्बई कि ये ‘मैट्रो’ भारतीय रेल क्यों नही है।समझ नहीं आता। मैट्रो के शाहदरा स्टेशन से पहले कहा जाता है कि “अगला स्टेशन शाहदरा है यहां से आप भारत के अन्य स्टेशनों के लिये ‘भारतीय रेल’ पकड़ सकते हैं”। क्या मैट्रो भारतीय रेल नही है.........
थर्ड क्लास कर्मचारी
फर्स्ट क्लास आफिसर होता है,सेकेंड क्लास आफिसर होता है।लेकिन थर्ड क्लास कर्मचारी होता है।शायद ठीक भी है!क्योंकि उसकी सोच भी थर्ड क्लास होती है।इसीलिये थर्ड क्लास कर्मचारी हमेशा भूखों मरता है।हमेशा मेहनत करेगा,दिन-रात एक करके आगे बढने की सोचेगा।दूसरों के साथ नेकी करेगा और अपने बच्चों को भी यही शिक्षा देगा।“वो”नहीं जानता कि आजकल मेहनत करके खाने वाला बेवकूफ होता है।बुजुर्गों की एक कहावत के अनुसार-नेकी करने वाले का पेट तो भरा ही रहता है(नेकी कर जूते खा)। आजकल आवारा घूमकर,लोगों को मूर्ख बनाकर,उल्टे को सीधा समझाकर, खाने वाला “चमचम” खाता है।जबकि थर्ड क्लास कर्मचारी की जिंदगी आटा-दाल में ही बीत जाती है। लेकिन आटे-दाल के भावों का मारा इंसान अपनी जिंदगी बिताने के लिये क्या करे? क्या करें?लगा रहे आटा-दाल में, वरना सोच बदल और पार्ट टाईम आटा-दाल बेच भिण्डी बेच, बल्ले-बल्ले कर। हमारे एक उधारी टाईप(थर्ड क्लास) मित्र कल मिल गये।लगे रोना रोने-”यार महीने का अंत चल रहा है,इस महीने खर्च भी कुछ अधिक हो गया,तनख्वाह भी तो नहीं आयी। तू ही कुछ सहारा लगा दे।अगले महीने वापस कर दुंगा।“मैंने कहा-“यार वापस तो तभी करेगा ना जब मैं दुंगा,मैं खुद शर्मा जी से लाया था।और फिर तू ही सोच मैं कहां से दे सकता हूँ।मैं तो वैसे भी एक टीचर हूँ।रजिस्टर्ड थर्ड क्लास कर्मचारी।जिसे सरकार भी थर्ड क्लास ही मानती है।इसीलिये इस जीव की तनखा ही दो-दो महीने देरी से आती है।“पता लगता है कल आ रही है,परसों आ रही है।जैसे तनखा न हो यू0 पी0 का मानसून हो। तनखा क्या भाई साहब तन-खा हो गयी है।इस वेतन ने हमें बे-तन कर दिया है।बीस रुपये चार दिन से कलेजे से लगाये हूँ।कहीं खर्च न हो जायें।शाम ठीक ठाक गुजर जाती है तो उपर की जेब में रख लेता हूँ।सुबह दर्शन करके फिर छुपा लेता हूँ,भीतरी जेब में।जब बीवी नयी-नयी आयी थी तो उसके छूने भर से शरीर में रोमांच का ज्वार-भाटा आ जाता था।आज जब पास आकर बैठ जाती है और प्यार से कह्ती है-‘कि ए जी सुनो’ तो सांस द्ण्ड-बैठक लगाने लगती है।भय के बादल से छा जाते हैं और दिल पर भीनी-2 बूंदों की आवाज की जगह आती है ओले गिरने की गड़गड़ाहट।कि ले बेटा आयी कोई नयी फरमाईश। मित्र का चेहरा लटक गया।हमने अपनी फैमली पुराण का पाठ जारी रखते हुये कहा-भैया पिछले कई दिनो से धर्मपत्नी और चिल्लर कोई टॉप क्लास सब्जी बनवाने की जिद कर रहे है।लेकिन हम खराब उदर का बहाना करके रोज खिचड़ी पकवा रहे है।जब आज भी हमने यही तीर चलाया तो पत्नी का ब्रह्मस्त्र आया।“तडका लगाने के लिये तेल तो ले आओ”।हमने मन ही मन कहा-ले बेटा हो गया बीस का नोट शहीद! खैर हमें बुझे मन से बाजार जाना पड़ा।और बीस रुपयों को तिलांजलि देने के पश्चात हम चेहरा लटकाकर ये गीत गुंनगुनाते आ रहे थे “जाने वाले आजा तेरी याद ...”और गाते हुऐ दरवाजे में घुसे ही थे कि तभी पीछे से एक दूर के रिश्तेदार”तुमने पुकारा और हम चले आये वाले अँदाज में बोले-भाईसाहब आपको कैसे पता हम आने वाले हैं।हमारा सिर चकरघिन्नी बन गया।हमने मन ही मन उस गीतकार को जी भरकर छटीं-छटी गालिंया दी जिसके इस गीत ने हमारा बजट बिगाड़ दिया था। हमारे वे मित्र रोने लगे और जेब में से कुछ निकाल के हमारी हथेली पर रख दिया।हमने देखा वे पाँच रुपये थे।हमने पूछा ये किसलिये ?वे बोले –अतिथि देवो भव:।चाय पिला देना,क्या पता देव खुश हो जाये। और समय से वेतन मिलने का वरदान दे जाये। MANOJ Page 2 a/o/H