थर्ड क्लास कर्मचारी
फर्स्ट क्लास आफिसर होता है,सेकेंड क्लास आफिसर होता है।लेकिन थर्ड क्लास कर्मचारी होता है।शायद ठीक भी है!क्योंकि उसकी सोच भी थर्ड क्लास होती है।इसीलिये थर्ड क्लास कर्मचारी हमेशा भूखों मरता है।हमेशा मेहनत करेगा,दिन-रात एक करके आगे बढने की सोचेगा।दूसरों के साथ नेकी करेगा और अपने बच्चों को भी यही शिक्षा देगा।“वो”नहीं जानता कि आजकल मेहनत करके खाने वाला बेवकूफ होता है।बुजुर्गों की एक कहावत के अनुसार-नेकी करने वाले का पेट तो भरा ही रहता है(नेकी कर जूते खा)। आजकल आवारा घूमकर,लोगों को मूर्ख बनाकर,उल्टे को सीधा समझाकर, खाने वाला “चमचम” खाता है।जबकि थर्ड क्लास कर्मचारी की जिंदगी आटा-दाल में ही बीत जाती है। लेकिन आटे-दाल के भावों का मारा इंसान अपनी जिंदगी बिताने के लिये क्या करे? क्या करें?लगा रहे आटा-दाल में, वरना सोच बदल और पार्ट टाईम आटा-दाल बेच भिण्डी बेच, बल्ले-बल्ले कर। हमारे एक उधारी टाईप(थर्ड क्लास) मित्र कल मिल गये।लगे रोना रोने-”यार महीने का अंत चल रहा है,इस महीने खर्च भी कुछ अधिक हो गया,तनख्वाह भी तो नहीं आयी। तू ही कुछ सहारा लगा दे।अगले महीने वापस कर दुंगा।“मैंने कहा-“यार वापस तो तभी करेगा ना जब मैं दुंगा,मैं खुद शर्मा जी से लाया था।और फिर तू ही सोच मैं कहां से दे सकता हूँ।मैं तो वैसे भी एक टीचर हूँ।रजिस्टर्ड थर्ड क्लास कर्मचारी।जिसे सरकार भी थर्ड क्लास ही मानती है।इसीलिये इस जीव की तनखा ही दो-दो महीने देरी से आती है।“पता लगता है कल आ रही है,परसों आ रही है।जैसे तनखा न हो यू0 पी0 का मानसून हो। तनखा क्या भाई साहब तन-खा हो गयी है।इस वेतन ने हमें बे-तन कर दिया है।बीस रुपये चार दिन से कलेजे से लगाये हूँ।कहीं खर्च न हो जायें।शाम ठीक ठाक गुजर जाती है तो उपर की जेब में रख लेता हूँ।सुबह दर्शन करके फिर छुपा लेता हूँ,भीतरी जेब में।जब बीवी नयी-नयी आयी थी तो उसके छूने भर से शरीर में रोमांच का ज्वार-भाटा आ जाता था।आज जब पास आकर बैठ जाती है और प्यार से कह्ती है-‘कि ए जी सुनो’ तो सांस द्ण्ड-बैठक लगाने लगती है।भय के बादल से छा जाते हैं और दिल पर भीनी-2 बूंदों की आवाज की जगह आती है ओले गिरने की गड़गड़ाहट।कि ले बेटा आयी कोई नयी फरमाईश। मित्र का चेहरा लटक गया।हमने अपनी फैमली पुराण का पाठ जारी रखते हुये कहा-भैया पिछले कई दिनो से धर्मपत्नी और चिल्लर कोई टॉप क्लास सब्जी बनवाने की जिद कर रहे है।लेकिन हम खराब उदर का बहाना करके रोज खिचड़ी पकवा रहे है।जब आज भी हमने यही तीर चलाया तो पत्नी का ब्रह्मस्त्र आया।“तडका लगाने के लिये तेल तो ले आओ”।हमने मन ही मन कहा-ले बेटा हो गया बीस का नोट शहीद! खैर हमें बुझे मन से बाजार जाना पड़ा।और बीस रुपयों को तिलांजलि देने के पश्चात हम चेहरा लटकाकर ये गीत गुंनगुनाते आ रहे थे “जाने वाले आजा तेरी याद ...”और गाते हुऐ दरवाजे में घुसे ही थे कि तभी पीछे से एक दूर के रिश्तेदार”तुमने पुकारा और हम चले आये वाले अँदाज में बोले-भाईसाहब आपको कैसे पता हम आने वाले हैं।हमारा सिर चकरघिन्नी बन गया।हमने मन ही मन उस गीतकार को जी भरकर छटीं-छटी गालिंया दी जिसके इस गीत ने हमारा बजट बिगाड़ दिया था। हमारे वे मित्र रोने लगे और जेब में से कुछ निकाल के हमारी हथेली पर रख दिया।हमने देखा वे पाँच रुपये थे।हमने पूछा ये किसलिये ?वे बोले –अतिथि देवो भव:।चाय पिला देना,क्या पता देव खुश हो जाये। और समय से वेतन मिलने का वरदान दे जाये। MANOJ Page 2 a/o/H
शनिवार, 10 जुलाई 2010
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