शनिवार, 10 जुलाई 2010

भारतीय रेल बनाम मैट्रो रेल

देश के विकास मे रेलगाडी का अपना विशेष महत्व रहा है।बचपन में जब मैं पहली बार रेलगाड़ी में बैठा तो लगा था जैसे मैं विकासशील से विकसित हो गया हुं।वैसे कुछ भी कहिये रेलगाडी का सफर है मजेदार, ऐसा आन्नद सिर्फ लोकल बस को छोड्कर कहीं नही आ सकता। लेकिन देश में विकास की गति के अनुरूप ही रेलगाडी का भी विकास होता गया है।शयनयान बन गये,वातानुकूलित प्रथम,द्वितीय,तृतीय बन गये ।
यंहा तक तो ठीक था ।लेकिन मैट्रो रेल ने आकर तो जैसे सारे सफर का सत्यानाश ही कर दिया है। अब देखिये भारतीय रेल में यात्रा का आन्नद ही कुछ और था।पहले पता करो फलां स्टेशन के लिये कौन सी ट्रेन और कितने बजे जायेगी।फिर उसके टिकिट लेने में नहीं, तो ट्रेन में अवश्य एक न एक सम्बंध बन जाता था। अब मैट्रो में बैठो दस मिनट पश्चात गंतव्य पर,हैलो हाय भी हो जाये तो बहुत समझिये। ट्रेन के सफर में जाने से पहले एक घंटे पहले स्टेशन पहुंचना होता था।बेशक इंतजार क्यों ना करना पडे, भागमभाग मे कभी ट्रेन निकल जाती तो पता चलता कि अगली ट्रेन तो भाई पांच घंटे बाद है। मैट्रो ने इंतजार का सारा मजा ही किरकिरा कर दिया है,हर पांच मिनट में ‘चिराग के जिन्न’ की तरह प्रकट हो जाती है।
अब ‘जो मजा इंतजार में है,विसाले यार मे कहां’। ट्रेन में पडोसी से बात करने की सारी सम्भावनओं की हंता है मैट्रो रेल ।
सुनिये- अगला स्टेशन कौन सा है?
कोई योवना या नवयोवना पूछ लेती थी तो अगला स्टेशन बताने के साथ ही कई और अगले प्रश्न करने का मौका मिल जाता था।
प्रेममनगर है जी वैसे आपको कहां जाना था जी। अच्छा हुआ जो आपने ये गाडी पकड़ ली अगली गाड़ी पाँच बजे थी।
अब मैट्रो में गंतव्य से पहले ही बधिरों के लिये अगले स्टेशन का नाम लिखा आ जाता है,द्रष्टिहीनों के लिये उदघोषिका विनम्रतापूर्वक बता देती है।जो चक्षु व कर्ण दोनों रखते हैं वे दोनों कार्य करते हैं
और तो और वो कर्णप्रिय आवाज ये भी बता देती है कि दरवाजे किस तरफ खुलेंगे।
टकराने की सम्भावनाओं की भी इतिश्री।लेकिन भारत के मैट्रो शहर दिल्ली,मुम्बई कि ये ‘मैट्रो’ भारतीय रेल क्यों नही है।समझ नहीं आता। मैट्रो के शाहदरा स्टेशन से पहले कहा जाता है कि “अगला स्टेशन शाहदरा है यहां से आप भारत के अन्य स्टेशनों के लिये ‘भारतीय रेल’ पकड़ सकते हैं”। क्या मैट्रो भारतीय रेल नही है.........

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें