शनिवार, 10 जुलाई 2010

भक्त भोग भगवान
मैं बचपन से सुनता आया था।कि भक्त और भगवान का रिश्ता अटूट होता है।इनके बीच का बन्धन फैविकौल के मजबुत जोड की तरह सुद्र्ढ होता है।भक्त भगवान से जब चाहे साक्षात्कार कर सकता है।और भक्त की एक पुकार पर भगवान दौडे चले आते हैं।लेकिन काफी समय भगवान के इंतजार में गुजरने के पश्चात हमें लगा की भक्तो की संख्या बेरोजगारों की बढती हुई संख्या की तरह बढ जाने से भगवान को हमारी सुधि नही आयी शायद इसी लिये
हमारी अपाइंटमेंट मिस हो रही है।हमारे दिल ने कहा क्या हुआ जो नारयण को हमसे मिलने
का समय नही मिल रहा।हम ही ’उनसे’मिल आते है।अब समस्या ये कि भगवान से कंहा मिला जाये।इस समस्या को हल किया हमारे परम मित्र तिवारी ने ।बोले-भगवान भक्तो से मिल कर अपने घर तो वापस आते ही होंगे।हम उनके गॉव पहुंचकर उनके निवास पर ही उनसे मिल लेते है। हम श्रद्धापूर्वक (नंगे पैर बाइक पर सवार होकर) मथुरा भगवान श्री कृष्ण से मिलने पहुंच गये। स्नान-ध्यान के पश्चात जब हमने उनके सदन मै प्रवेश किया तो देखा कि भगवान के द्वार पर आवेदको की लम्बी क्यु है।हमने अपने मित्र से कहा ‘भईया तिवारी’ पब्लिक तो इनके निवास पर ही इतनी है कि भगवान बाहर के भक्तो को दर्शन देने कैसे जाते होगें।जब हमें लाइन में खडे-2 एक घण्टा गुजर गया और पंक्ति एक गज भी आगे नही बढी तो हमारा धेर्य जवाब दे गया।हमने कहा भई तिवारी ये पंक्ति आगे क्युं नही चल रही,चलो पंक्ति तोड कर ही आगे बढ जाते है।तिवारी ने कहा महोदय लाइन मे लगे रहोगे तो नम्बर आ भी सकता है।बिना लाइन के तो भोग वालो का ही नम्बर आता है।जो तुम्हारे पास है नही।हमने समझकर भी अनजान बनते हुऎ कहा- सखा तिवारी भगवान भोग तो हमारे हाथों में है।फिर तुम कौन से भोग की बात कर रहे हो।तिवारी हमारा हाथ पकडकर पंक्ति से निकाल लाये और समझाते हुऎ बोले महोदय जब किसी बडे अधिकारी से कोई काम निकलवाना हो तो पहले उसके चपरासी को प्रसन्न करना पडता है।और उन्हें आदर पूर्वक भोग भेंट करना पडता है।अब यदि वो भोग उन्हें पसन्द है।तो अधिकारी से आपकी मुलाकात पक्की इसी तरह का कानून भगवान के निवास पर भी है।यदि आपको भगवान से मिलना हो तो डाक्टर के एमरजेंसी चार्ज की तरह आपको भी एमरजेंसी भोग देना होगा तभी ये पुजारी महोदय भगवान से मिलने दे सकते है।अब कैजुअल और स्पेशल में कुछ तो अंतर होगा ही,या नही।तभी अचानक हमारी द्र्ष्टी दो दरवाजे से होती हुई तीसरे दरवाजे तक पंहुची जंहा भगवान का सिंहासन था। महंत आठ सात भक्त व भक्तिनो को भगवान के चरणो में विठाकर पूजा अनुष्ठान करा ईश को प्रसन्न करने की कोशिश मे लगा था।शायद इसीलिये पंक्ति आगे नहीं बढ़ रही थी।और हम जैसे भक्त भगवान से बीस गज दूर खडे थे।अंतर सिर्फ इतना था की अन्दर वालों पर लड्डूओं से भरे थाल और नोटों से भरी जेब का भोग था।जबकि हमारे पास सवा दो रूपये का।
अब हमारी समझ मैं आ गया था कि आज कल भगवान भक्तों से मिलने क्यों नही आते।अब ये भी क्या कि आओ और वरदान भी दो। जब वैठे-बिठाये देने की बजाये और मिल रहा हो।तो कंही जाके दर्शन देने की क्या आवश्यकता है।कुछ देर मे वे भक्त पूजा कर चले गये अब हम ‘जैसे’ सामान्य भक्तों की बारी थी।महंत ने कहा, सभी भक्त अपना भोग पहले दरवाजे से अन्दर फैकते जायें और निकलते जायें।भगवान भोग फेंका जाने लगा,भगवान उस भोग में दब गये।और हम भी सोचने लगे कि बिना भोग के भगवान के दर्शन करना पाप करने के समान है।हम टूटे मन से वापिस आ गये और मन बहलाने को सोचने लगे कि ईश्वर तो सब जगह ही फिर कहीं जाने की क्या आवश्यकता है।‘क्यों ठीक है न’।
(समाप्त)

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